बालि की ताकत और शूरवीरता जानकार
अचम्भित हो जायेंगे आप –
वानरराज बालि किष्किंधा
का राजा और सुग्रीव का बड़ा भाई था। बालि का विवाह वानर वैधयराज सुषेण की पुत्री
तारा के साथ संपन्न हुआ था। तारा एक अप्सरा थी।
एक कथा के अनुसार समुद्रमंथन
के दौरान चौदह मणियों में से एक अप्सराएँ थीं। उन्हीं अप्सराओं में से एक तारा थी।
बालि और सुषेण दोनों मन्थन में देवतागण की मदद कर रहे थे। जब उन्होंने तारा को
देखा तो दोनों में, उसे पत्नी बनाने की होड़ लगी। बालि तारा के दाहिनी तरफ़ तथा
सुषेण उसके बायीं तरफ़ खड़े हो गये। तब विष्णु ने फ़ैसला सुनाया कि विवाह के समय
कन्या के दाहिनी तरफ़ उसका होने वाला पति तथा बायीं तरफ़ कन्यादान करने वाला पिता
होता है। अतः बालि तारा का पति तथा सुषेण उसका पिता घोषित किये गये।
बालि के पिता का नाम
वानरश्रेष्ठ 'ऋक्ष' था। बालि के धर्मपिता
देवराज इन्द्र थे। बालि का एक पुत्र था जिसका नाम अंगद था। बालि गदा और मल्ल
युद्ध में पारंगत था। धरती पर उसे सबसे शक्तिशाली माना जाता था, लेकिन उसमें साम्राज्य
विस्तार की भावना नहीं थी। बालि भगवान सूर्य का उपासक और धर्मपरायण था। हालांकि
उसमें दूसरे कई दुर्गुण थे जिसके चलते उसको दुख झेलना पड़ा।
रामायण के अनुसार बालि में
एक विचित्र शक्ति थी, उसे ब्रह्मा
ने वरदान दिया था की बालि जब भी रणभूमि में अपने दुश्मन का सामना करेगा तो उसके दुश्मन
की आधी शक्ति क्षीण हो जाएगी और यह आधी शक्ति बालि को प्राप्त हो जाएगी। इस कारण
से बालि लगभग अजेय था।
बालि के आगे रावण की एक
न चली थी। रामायण में ऐसा प्रसंग आता है कि एक बार जब बालि संध्यावन्दन के लिए जा
रहा था, तो आकाश से नारद मुनि जा रहे थे। बालि ने उनका अभिवादन किया तो नारद ने
बताया कि वह लंका जा रहे हैं जहाँ लंकापति रावण ने देवराज इन्द्र को परास्त करने
के उपलक्ष में भोज का आयोजन किया है। चञ्चल स्वभाव के नारद – जिन्हें सर्वज्ञान है – ने बालि से चुटकी लेने
की कोशिश की और कहा कि अब तो पूरे ब्रह्माण्ड में केवल रावण का ही आधिपत्य है और
सारे प्राणी, यहाँ
तक कि देवतागण भी उसे ही शीश नवाते हैं। बालि ने कहा कि रावण ने अपने वरदान और
अपनी सेना का इसतेमाल उनको दबाने में किया है, जो निर्बल हैं लेकिन मैं उनमें से
नहीं हूँ और आप यह बात रावण को स्पष्ट कर दें। सर्वज्ञानी नारद ने यही बात रावण को
जा कर बताई जिसे सुनकर रावण क्रोधित हो गया। उसने अपनी सेना तैयार करने के आदेश दे
डाले। नारद ने उससे भी चुटकी लेते हुये कहा कि एक वानर के लिए यदि आप पूरी सेना
लेकर जायेंगे तो आपके सम्मान के लिए यह उचित नहीं होगा। रावण तुरन्त मान गया और
अपने पुष्पक विमान में बैठकर बालि के पास जा पहुँचा। बालि उस समय संध्यावन्दन कर
रहा था। बालि की स्वर्णमयी कांति देखकर रावण घबरा गया और बालि के पीछे से वार करने
की चेष्टा की। बालि अपनी पूजा अर्चना में तल्लीन था लेकिन फिर भी उसने उसे अपनी
पूँछ से पकड़कर और उसका सिर अपने बगल में दबाकर पूरे विश्व में घुमाया। उसने ऐसा
इसलिए किया कि संपूर्ण विश्व के प्राणी रावण को इस असहाय अवस्था में देखें और उनके
मन से उसका भय निकल जाये। इसके पश्चात् रावण ने अपनी पराजय स्वीकार की और बालि की
ओर मैत्री का हाथ बढ़ाया जिसे बालि ने स्वीकार कर लिया।
इसी में एक कथा आती है
कि, माया नामक असुर स्त्री के दो पुत्र थे — मायावी तथा दुंदुभि। दुंदुभि
महिष रूपी असुर थे, किष्किन्धा के द्वार पर जाकर बालि को द्वंध (युध) के लिए
ललकारा। मदमस्त बालि ने पहले तो दंभी दुंदुभि को समझाने की कोशिश की परन्तु जब वह
नहीं माना तो बालि द्वंध (युध) के लिए
राज़ी हो गया और दुंदुभि को बड़ी सरलता से हराकर उसका वध कर दिया। इसके पश्चात् बालि
ने दुंदुभि के निर्जीव शरीर को उछालकर एक ही झटके में एक योजन दूर फेंक दिया। शरीर
से टपकती रक्त की बूंदें महर्षि मतङ्ग ऋषि के आश्रम में गिरीं जो कि ऋष्यमूक पर्वत
में स्थित था। क्रोधित मतङ्ग ने बालि को शाप दे डाला कि यदि बालि कभी भी उनके
आश्रम के एक योजन के दायरे में आया तो वह मृत्यु को प्राप्त होगा।
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